Monday, October 30, 2017

Chahta hun


फिर आज कुछ दर्द जगाना चाहता हूँ
राग ऐ रंज फिरसे मैं गाना चाहता हूँ

चलता रहा हूँ बेख़ौफ़, बोहोत बेफिक्री में
थाम के दिल दो पल, अब घबराना चाहता हूँ

मुद्दतों से चल रही, सीने में ये बेदखल
धड़कनों को दो घडी रुकवाना चाहता हूँ

डर है कहीं ना हो, अंजाम फिर तर्क ऐ वफ़ा
फिर से दीवानगी, जो परवान चढ़ाना चाहता हूँ

वक़्त ऐ रुखसत पे भी तेरा ही दीदार हो
मौत से मैं ज़ीस्त नज़राना चाहता हूँ

चाहता हूँ बोहोत कुछ इस शर्त पे सब छोड़ दूँ
भर के आगोश में तुझको, फ़ना हो जाना चाहता हूँ

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