अंधेरों का तकाज़ा है हो चराग़ाँ कू ऐ क़ातिल में सब क़त्ल होने उमड़े है कोई जीनेवाला नहीं आया
मुसलसल गिरता है जज़्ब फटे गिरेबानों से कब से थामे खड़े है कोई पीने वाला नहीं आया
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