हम कब ना थे मयस्सर, तेरा इंतज़ार करते शब भर यूँ आहें भर के दिन बेक़रार होता नशा ए आरज़ू पे बादा-ख़वार भी हम ग़म ए यार गर जो मिलता, वो क्या ख़ुमार होता
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