Inspired by Ghalib's हज़ारों ख्वाहिशें...
निकलना हम भी सुनते आए, खु़दी का खु़ल्द से अक्सर
हज़ारों मुद्दतों पर भी वही क़िस्सा ए ग़म निकले,
खुदा के वास्ते ला दे कहीं से जाम ओ जम साक़ी
बोहोत बे आब ए रूह हो कर के उस कूचे से हम निकले
हज़ारों मुद्दतों पर भी वही क़िस्सा ए ग़म निकले,
खुदा के वास्ते ला दे कहीं से जाम ओ जम साक़ी
बोहोत बे आब ए रूह हो कर के उस कूचे से हम निकले
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