Wednesday, July 16, 2014

बेरुख़ी

ना झटको ज़ुल्फ़ बेरुख़ी से
इसमे अटका है, दिल कांच का
ना फे़रो नज़र बेहिचक, इनसे
बंधा है धागा रुकी सांस का

ज़रा आहिस्ता करो ये पेश-कदमी
आगे फ़िसलन है मेरे ख़यालों की
भर के आह पूछ लें नाम तुमसे
बस इतनी अज़्म, मेरे सवालों की

Friday, June 27, 2014

हज़ारों ख्वाहिशें और

Inspired by Ghalib's हज़ारों ख्वाहिशें...
निकलना हम भी सुनते आए, खु़दी का खु़ल्द से अक्सर
हज़ारों मुद्दतों पर भी वही क़िस्सा ए ग़म निकले,
खुदा के वास्ते ला दे कहीं से जाम ओ जम साक़ी
बोहोत बे आब ए रूह हो कर के उस कूचे से हम निकले

Thursday, January 30, 2014

जब हम कहें

Inpired by Sahir's Jab Hum Chalein from Pyaasa

हम कहें तो के जैसे लफ्ज़ रवां दौड़ में
तुम कहो तो जैसे मौसीक़ी चेहेल निकले
चुप्पी हमारी अरसों, खो जाये तहख़ानों में
तुम्हारी ख़ामोशी पलभर, शायर कि ग़ज़ल निकले


Saturday, January 18, 2014

आंखों से ही पढ़ लीजे

क्या खोलूं दिल के राज़ सभी
कुछ खुद अंदाजा़ कर लीजे
क्या बोलूं लब की बात अभी
कुछ आखों से भी पढ़ लीजे

कर लीजे लरज़िश की क़यास
सूखे लब पर जो दिल की प्यास
अरमान पोशीदा पढ़ लीजे
कुछ ख़ुद अंदाजा़ कर लीजे

कुछ ज़ुल्फ़ों के पेचे खोलें
ख़ामोश जुबां से कुछ बोलें
ये रााा बेपर्दा कर लीजे
अब आखों से ही पढ़ लीजे