है ज़ाहिर हसीं निगाहों में
पर्दा क्यूँ ओढ़ाए जाता है
नहीं राज़ रहा तेरा राज़ कोई
क्या दिल में छुपाये जाता है
यूँ लिखा हुआ पेशानी पे
है सबब तेरी बेचैनी का
फिर ऐसे थमी ज़ुबान में क्यूँ
अलफ़ाज़ दबाये जाता है
जानो शायर पढ़ लेता है
ख़त का मज़मूँ लिफ़ाफ़े पे
हर अदा में इक पैग़ाम मिले
क्यूँ पता छुपाये जाता है
पर्दा क्यूँ ओढ़ाए जाता है
नहीं राज़ रहा तेरा राज़ कोई
क्या दिल में छुपाये जाता है
यूँ लिखा हुआ पेशानी पे
है सबब तेरी बेचैनी का
फिर ऐसे थमी ज़ुबान में क्यूँ
अलफ़ाज़ दबाये जाता है
जानो शायर पढ़ लेता है
ख़त का मज़मूँ लिफ़ाफ़े पे
हर अदा में इक पैग़ाम मिले
क्यूँ पता छुपाये जाता है
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