नही शौक ए गु़ल, हमे खा़र का है
खिजा़ं मे रूठी बहार का है
चैन ओ सुकून ए बेजा़री का
दिलचस्प ये दिल बेक़रारी का
उलझी ज़ुल्फों के पेचों का
ना सुर्ख हसीं रुख्सार का है
हुस्न ए तमन्ना ना जिस्म ए तलब
न ही तफ्स किसी इज़हार का है
है शोक बदलते वादों का
नए वक़्त में भूली यादों का
मिलते हैं सूखे फूल जहाँ
उन आधी पढ़ी किताबों का
हमे शोक नहीं तिलिस्मों का
दोज़ख जन्नत की किस्मों का
बस जुस्तजू इस राज़ की है
ये धुन किस टूटे साज़ की है
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