Tuesday, March 20, 2012

Bezaar tere sheher me

रुक गया है कारवां, यूँ आ के तेरे शहर में
थम गयी हो मौज ऐ दरिया, जा के किसी लहर में

फँस गयी है कश्ती ऐसे, बढ़ रही ना डूबती
है क़यामत गुमशुदा, बरपा क्या तेरे केहर में

खींच कर लायी थी मुझको, तिलिस्म ऐ बातिल ऐ शमा
बुझ गयी वो रौशनी, तिलमिला के तेरी सेहर में

ख्वाबों के इस अंजुमन में गिर के टूटे है इतने
हो गयी बेख्वाब डर से निगाहें तेरे शहर में

सींचि है बेज़ार मेने इस शहर की तिश्नगी
पी रहा हूँ मिला के, ज़िन्दगी तेरे ज़हर में

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